आपका ब्राउज़र Text-to-Speech सपोर्ट नहीं करता।
नदी के उस पार
नदी के उस पार एक खूबसूरत
जमीन है
हवा है,पानी है
और उन्मुक्त आसमान है।
इसी उम्मीद में नदी के किनारे खड़े हो
उस पार ताकती रही।
अफसोस करती रही
उस पार नही पहुँचने का
और आनन्द भी नही उठा सकी
इस पार मिलने वाली नेमतों का
शुक्रिया भला क्या ही करती।
फिर एक नाविक
किनारे पर आकर ठहरा
थाम कर पतवार पूछा
क्या चलना है उस पार
और मैं अतिउत्साही
चल पड़ी उस पार
वही धरा,वही अम्बर,वही हवा
वही मिट्टी के नामोनिशान
फिर लगा
जो मिला है वही बेहतर है
बस मिल जाने के बाद क़द्र नही होती
कई बार।
रूचिका राय

