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सागर का संदेश – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
अथाह मन का मीत यहाँ पर, यह जग सारा खारा है,
सीने में रहस्य दबाए बैठा, लहरों का वो धारा है।
खोलता जब भी मुट्ठी अपनी, अनमोल रत्न वह देता है,
जिसके दम पर सृष्टि चलती, सबका दुख हर लेता है।
बेशकीमती मोती देकर, सागर भी आज बेचारा है,
ध्यान से देखो तो वो भी, मानवीय सोच का मारा है।
लाख भलाई हो पर संसार, को हरदम वह अखरता है,
“पानी इसका खारा है”, बस यही गिला हर व्यक्ति करता है।
कौड़ी भर की कमी को देखो, लोग पहाड़ बनाते हैं,
बरसों के गहरे एहसानों को, पल भर में भूल जाते हैं।
रीत पुरानी है इस जग की, खूबियाँ यहाँ कौन सराहता है?
कमियाँ ही बस याद हैं रहती, इतिहास यही बतलाता है।
पर ऐ राही! तू मत थमना, सागर से यह सीख उठाना,
संसार चाहे जो भी बोले, तू अपनी अच्छाई मत भुलाना।
खारेपन के शोर में भी, तू मोतियों को बुनते जाना,
मानव का स्वभाव छोड़, तू अपना कर्तव्य निभाते जाना।
लाख छुपाओ कलंक यहाँ, संसार तो चाँद निहारता है,
पर देखो मानव की प्रवृत्ति, उसमें भी कमी निकालती है।
तुम अमृत का घट भर लाओ, वो ज़हर की बूँदें ढूँढेंगे,
सच्ची राह पे चलने वालों से, यहाँ लोग आँखें मूँदेंगे।
पर याद रहे हर सीप यहाँ, लहरों से लड़कर सजती है,
सच्ची नीयत की गूँज हमेशा, जग के कोने में बजती है।
तू सागर सा गंभीर बन, हर कड़वे घूँट को पीता जा,
कमियों की परवाह किए बिन, अपनी खूबियाँ जीता जा।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

