स्वतंत्रता-दिवस आया है,
हर आँगन उल्लास समाया है।
केसरिया, श्वेत, हरा तिरंगा,
गर्व से नभ में लहराया है।
ज्यों ही यह पावन दिन आता,
मन इतिहास में खो जाता।
लहूलुहान उन वीरों का चेहरा,
स्मृति-पटल पर छा जाता।
त्याग, तपस्या, बलिदानों की
अमर कहानी बोल उठी;
भारत माँ की पावन मिट्टी
वीरों की जय बोल उठी।
अंग्रेजों की क्रूर हुकूमत
जिसने भारत को ललकारा,
वीरों ने भी प्रण कर डाला—
“अब होगा भारत हमारा।”
“वन्दे मातरम्!” का गूँजता स्वर,
“भारत माता की जय!” पुकार;
हँसते-हँसते फाँसी चूमी,
कर दिया जीवन राष्ट्र पर वार।
माँ ने बेटे न्योछावर किए,
बहनों ने खोए अपने भाई;
सुहाग लुटाकर वीरांगनाओं ने
भारत-माता की लाज बचाई।
अंतिम क्षण में वीरों ने भी
बस इतना संदेश सुनाया—
“हम रहें न रहें, ऐ साथियो,
भारत अमर सदा रह जाए।”
काला पानी, जेल, यातनाएँ,
डिगा न उनका दृढ़ विश्वास;
स्वराज्य-दीप जलाने निकले,
बनकर जन-जन की आस।
गाँधी का सत्य-अहिंसा पथ,
सुभाष का अदम्य हुंकार;
राजेन्द्र बाबू की सादगी,
शास्त्री जी का ऊँचा विचार।
विवेकानन्द की अमर वाणी
आज भी देती है संदेश—
“उठो, जागो, आगे बढ़ो,
सर्वप्रथम महान हो देश।”
आओ ऐसा प्रण दोहराएँ,
वीरों का सम्मान करें;
पूर्वजों की अमर विरासत का
जीवन भर अभिमान करें।
झूठी शान नहीं अपनाएँ,
सत्य-पथ से न कभी हटें;
जब तक तन में साँस रहे,
भारत-माता हेतु जिएँ।
हर घर तिरंगा लहराए,
हर हृदय राष्ट्रगान बने;
विश्व-पटल पर भारत माता
शांति और सम्मान बने।
जय हिन्द! जय भारत!
वन्दे मातरम्!
रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल
तुलसीपथ लाला पुल रघुनाथपुर
अंचल-ब्रह्मपुर (श्री ब्रह्मेश्वरनाथ धाम)
जिला – बक्सर

