बात मेरी मानकर अब आइए।
योग जीवन अंग है अपनाइए।।
जोड़ने की सीख सबमें यह भरे।
स्वस्थ तन दे रोग यह सारी हरे।।
शुद्ध भावों को हमारे मन गढ़े।
दिव्यता का बोध अंतस् में मढ़े।।
है कठिन यह सोच मत घबराइए।
योग जीवन अंग है अपनाइए।।०१।।
रक्त शोधन कर प्रखर तन तेज दे।
अस्थियाँ अवसाद से परहेज दे।।
चर्म का रौनक बढ़ा दे ताजगी।
नित्य है अभ्यास देती सादगी।।
परिजनों को भी जरा समझाइए।
योग जीवन अंग है अपनाइए।।०२।।
सुख सभी तन स्वस्थ होने से मिले।
चेहरा भी पुष्प सा हर-पल खिले।।
मुक्त सारे रोग से नित सब रहें।
ईश का आशीष इसको हम कहें।।
लोक हितकारी इसे बतलाइए।
योग जीवन अंग है अपनाइए।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

