देखो बसंत है।
देखो बसंत आया मीठी मीठी ठंड है,
फाग धुन गा रहा क्यों देखो मकरंद हैं।
हवा बासंती यह लाई अब सुगंध है,
मन के मयूर देख नाचे अनंत हैं।
चुनरी रंगीन देख हो गये मतंग हैं
बहुरंगी पुष्प देख हर्षित अंग अंग हैं।
बैठी कुछ आस लिए मन में उमंग है,
भौरा संगीत गाये झूमे, लागे भंग है।
लोग सब गीत गावे, प्रेम है उमंग है,
रंग ले गुलाल धावे, दर्पण रंग-रंग है।
मैं भी सोचूँ कैसी बैठूँ जब ना कोई संग है,
काहे बसंत आये कैसा फाग रंग है।
आँगन अब कान्हा आयो बातें बेढंग है,
रास फास हैं चलावे वो तो श्रीचंद हैं।
ना कर कान्हा बलजोरी , मन देखो तंग है,
देखो बसंत धुनि, सब ओर आनंद है।
डॉ. स्नेहलता द्विवेदी ‘आर्या’
उत्क्रमित कन्या मध्य विद्यालय शरीफगंज कटिहार
0 Likes
