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जब सपनों को दिशा नहीं मिलती थी,
जब उम्मीदें भी मौन खड़ी रहती थीं,
तब शिक्षा ने थामा बच्चों का हाथ,
और मुज़फ्फरपुर ने बदली अपनी बात।
अँधेरों से लड़कर जली जो लौ,
वह यूँ ही नहीं जल पाई थी कोई।
इसके पीछे था संकल्प अपार,
दूर तक देखने वाला विचार।
प्रशासन जब संवेदना से जुड़ा,
विद्यालय का भविष्य तब निखरा।
हर कक्षा में गूँजा एक ही स्वर,
“गुणवत्ता ही लक्ष्य”—विश्वास का घर।
सुजीत सर की शांत अगुवाई,
ने शिक्षा को नई पहचान दिलाई।
शिक्षकों की आँखों में फिर सपना जगा,
छात्रों ने खुद को आगे बढ़ता देखा।
आज जो मुस्कान है हर चेहरे पर,
वह वर्षों के परिश्रम की है अमर छाप इधर।
यह परिवर्तन आँकड़ों से नहीं,
दिलों से मापा जाता है यहीं।
और जब इतिहास यह कथा दोहराएगा,
तो एक नाम हर पंक्ति में झलक जाएगा—
कलम जो भीगी, भाव जो उतरे पार,
उसका साक्षी, उसका स्वर—विवेक कुमार।
विवेक कुमार


