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दीपवा के नेह – सुनील कुमार प्रजापति
मगही कविता – स्वरचित एवं मौलिक रचना
अँगना-अँगना दीप जरइले, चमके गाँव-गिराम,
माटी के ई छोटका दीपवा, लिखे नेह के नाम।
कुम्हार के हाथे जनमल, माटी के वरदान,
एकरा जोत से जगमग होवे, धरती अउर आसमान।
ना पूछे ई जात-पात के, ना पूछे धनवान,
सबके दुआरी रोशनी बाँटे, ई दीपवा महान।
तेल-बाती के संग जरइले, मन के सब अन्हार,
नेह-मोह के बाती बनके, चमके घर-दुआर।
माई के हाथे पकवान बने, बाबा सजावें थार,
नन्हका लइका हँसते-गाते, घूमे बारम्बार।
रंगोली के रंग बतावे, जीवन के पहचान,
मिल-जुल के जब पर्व मनइली, बढ़े प्रेम-सम्मान।
दीवाली खाली पर्व न हइ, ई संस्कृति के शान,
माटी, मेहनत, प्रेम आ सेवा, एकरे असली पहचान।
फटाका से का रोशनी होई, जे मन में अन्हार?
किसी गरीब के घर जरवा दऽ, एगो नेह के दीप अपार।
एगो दीप जलावऽ ज्ञान के, एगो जलावऽ प्यार,
एगो दीप जलावऽ ओह खातिर, जे बाट जोहे हर बार।
माटी के ई दीपवा कहे, सुनऽ दुनिया के लोग,
अपन जड़ से जुड़ल रहऽ, तबे मिटतई सब रोग।
जब ले माटी में सुगंध रही, जब ले बाती में तेल,
तब ले दीपावली कहतई, प्रेम के अमर संदेश।
अन्हरिया चाहे लाखो आवे, हिम्मत ना हारब हम,
नेह के दीप जरइते रहब, उज्जर होयत जग-जनम।
ई दीवाली बस एतने कहे—
घर-घर दीप जरय, मन-मन उजियार हो,
हर चेहरा पर मुस्कान, हर दिल में प्यार हो।
माटी के मान बढ़े, कुम्हार के सम्मान हो,
अपन संस्कृति के रोशनी से, जग में बिहार के नाम हो।
सुनील कुमार प्रजापति,
प्रधान शिक्षक
नवसृजित प्राथमिक विद्यालय इमामगंज, ओबरा, औरंगाबाद, बिहार

