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मातृशक्ति – बेबी अर्चना
हे मातृशक्ति अब जाग भी जाओ,
कर निज-अस्तित्व की तू पहचान।
बन सबला कर निज पथ- प्रशस्त,
तभी ही मिलेगा जग में सम्मान।
उम्मीदों के तुम पंख अब खोलो,
इन्द्रधनुष सी नभ में छा जाओ।
चाहे राहों में मिले बाधा अनगिन,
तुम निर्मल सरिता सी बह जाओ।
तुम शक्तिस्वरूपा, जीवन-आधार,
है धरा-गगन अपरिमित विस्तार।
जननी, भार्या, सुता, भगिनी बनकर,
संपूर्ण मानवता को देती हो सार।
वात्सल्यप्रेम, तप, त्याग की देवी,
हो शक्ति की तुम पुण्य प्रतीक।
संपूर्ण सृष्टि भी बिन तेरे अधूरी,
सहज स्नेह लुटाती हो निर्भीक।
सहनशीलता में उनका न सानी,
उर पाहन रख सबकुछ सहती।
प्रेम, दया और करूणाभाव संग,
समर्पण के कई पाठ है पढ़ती।
है नारी अगर समस्त जग-आधार,
फिर क्यों उनपर होता अत्याचार।
कोई आँख दिखाए गर अस्मत पर,
ले दुर्गा, चंडी और, काली अवतार।
बेबी अर्चना
मध्य विद्यालय कुआड़ी

