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मिट्टी के घरौंदों से बिजली के झालरों तक’ दीपावली – उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक ” 



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  • शीर्षक :- 🪔मिट्टी के घरौंदों से बिजली के झालरों तक’ दीपावली – उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक “ 

 

दीपावलीआईहै,दीपावलीआईहै,

बदलते दौर की याद दिलाई है

देखो! दीपावली सामने आई है,

हम सबके लिए ढेरों उपहार लाई है।

बीसवीं शताब्दी में हम क्या करते थे,

इक्कीसवीं में अब क्या करते हैं, यह बताने आई है।

 

विजयादशमी के बाद वर्षा अपने मायके चली जाती थी,

मिट्टी के घरों को तहस-नहस कर जाती थी।

वर्षा के अंतिम दिनों में मिट्टी के घर ढह जाते थे,

उनकी रौनक भी उजड़ी-उजड़ी हो जाती थी।

 

दीपावली के आगमन की खुशी में दीवारें चिकनाते थे,

खेतों से मुलायम मिट्टी लाकर नए लेप लगाते थे।

गौमाता के पवित्र गोबर से घर का फर्श सजाते थे,

धरती से जुड़कर मीठी धूप में सुख का अनुभव पाते थे।

 

चारों तरफ चूने से पुताई और लिपाई होती थी,

जिससे कीड़े-मकोड़े और हानिकारक जीव दूर होते थे।

धनतेरस के दिन नए बर्तन और झाड़ू की खरीदारी होती थी,

यमदीप जलाकर यमराज की पूजा की जाती थी।

 

घी के दीप देवताओं को श्रद्धापूर्वक भेंट चढ़ाते थे,

पूजा के पश्चात उनमें तेल डालकर दीप सजाते थे।

बच्चे-बच्चियाँ मिट्टी के सुंदर घरौंदे बनाते थे,

गुड़ियों के लिए उनमें सुख-सुविधाओं के साधन जुटाते थे।

 

मिट्टी के रंग-बिरंगे बर्तन, पशु-पक्षी और गुड़िया सजाते थे,

छोटे-छोटे घरौंदों में अपनी कल्पनाएँ बसाते थे।

मिट्टी के बर्तनों और खिलौनों में कारीगरों की कला होती थी,

दीवारों पर चित्रकारी कर परिवार की प्रतिभा झलकती थी।

 

नाना प्रकार के व्यंजन और मिष्ठानों से घरौंदे सजाते थे,

अन्न के विविध रूपों में लावा-मुढ़ी का भोग लगाते थे।

दुल्हन की सगाई में दीपावली के दिन पटाखे-झुरझुरी छोड़ते थे,

चमकीले बैनरों से शुभ दीपावली की खुशियाँ मनाते थे।

 

मगर इस साल क्या होगा, कैसे होगा, यह पूछने दीपावली आई है,

बदलते समय की नई तस्वीर दिखाने दीपावली आई है।

बने-बनाए सामान खरीदकर लोग अपनी कलाकारी भूल गए हैं,

परंपराओं के कितने सुंदर रंग आधुनिकता में खो गए हैं।

 

नई-नई पेंट और रसायनों से पक्के मकान रंगते हैं,

बनी-बनाई चीजें खरीदकर घरों को सजाते हैं।

विद्युत की रंग-बिरंगी झालरों से रोशनी फैलाते हैं,

पक्की इमारतों पर चमचमाती लाइटों के गोले लगाते हैं।

 

सारा संसार जगमग रोशनी से जगमगाता है,

हर घर दीपों की चमक से मुस्कराता है।

अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश सुनाना है,

अधर्म पर धर्म की विजय का दीप जलाना है।

 

असत्य पर सत्य की विजय का संकल्प दोहराना है,

मन के भीतर सद्भाव और प्रेम का दीप जलाना है।

दीपावली केवल सजावट और रोशनी का त्योहार नहीं,

अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूलना भी उचित नहीं।

 

स्वरचित रचनाकार:-

उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक”

डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर 

गोस्वामी तुलसीदास पथ लालापुल रघुनाथपुर 

अंचल- ब्रह्मपुर , जिला बक्सर

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