गूँजे आपस की लाली।
दो धर्मों के मेल निरंतर,सुख की धार बहाते हैं।
कुछ ऐसे कट्टरपंथी हैं,लपट कटार उठाते हैं।।
जब तक यह संबंधन कायम,प्रेम की बंसी बजती है।
गंगाधार पलट जाए तो, मानवता भी लजती है।।
मन करता है रच बस जाएँ एक ही बाग बगीचे में
एक महल में रहना सहना, झाँकें एक दरीचे में।।
ईद मुबारक जाकर कह दें,वापस होली की लाली।
स्कूल-मदरसा आना-जाना,गूँजे आपस की ताली।।
मंदिर-मस्जिद पास खड़े हों,मर्जी से आएँ-जाएँ।
एक थाल में खाना-पीना, स्वर्ग जमीं पर लहराएँ।।
टोपी उनको रहे मुबारक,लाली लाल ललाटों पर।
मुमकिन है कुछ असमंजस हो,कब्र-श्मशान सु-घाटों पर।।
राग-द्वेष ग्रसित दो पंछी,दीवारों से बँटे हुए।
अल्ला-ईश्वर दो शब्दों में,अलग-अलग हैं लटे हुए।।
देख पूर्णिमा मन हर्षित है,कहते कवि”अनजान” यहाँ।
हिंदू-मुस्लिम साथ जहाँ हों,क्या खिलते मुस्कान वहाँ!!
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
सेवानिवृत शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवेभदौर

