सार छंद
दूर न जाए माँ से बच्ची, बाहों में है सिमटी।
गोया डाली से कोई लतिका,रहती ज्यों है लिपटी।।
आँखों में पहला शिक्षालय,शिशु ने की ठहराई।
आपस की आँखों ने देखी,अद्भुत-सी गहराई।।
बाहर का मौसम जो भी हो,अंदर है हरियाली।
डाली पत्ती से लिपटी है,या पत्ती से डाली।।
नहा रही है प्रेम-सिंधु में,जननी-संतति जोड़ी।
प्रेमी आपस की दूरी को,सहे न मिलकर थोड़ी।।
द्वापर में माँ ने देखी थी, मिट्टी खाता बच्चा।
मुँह खुलवाते देखा अद्भुत,गिरी मात खा गच्चा।।
उदय काल जितना सुंदर हो,शाम सुहानी होती।
देखा है “अनजान” निरंतर,ढले सीप में मोती।।
आने वाले कल में शायद,ऐसा हो जाए तो।
यही आस में जीती माता,कान्हा मुस्काए तो।।
वासुदेव फिर कारा जाएँ,मात देवकी साथी।
भू पर वापस कथा-कहानी,स्वर्ग सिधारे स्वार्थी।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

