सूर्य का जब मेष धनु में, हो कभी भी वास।
लोग कहते वर्ष का अब, आ गया खरमास।।
मांगलिक कारज सभी ही, हों तभी से बंद।
सूर्य की गति मंद पड़ती, हीन हो आनंद।।
तीन वर्षों में सदा यह, संग लाता फंद।
मान्यता ऐसी यहाँ है, मोक्ष होता मंद।।
सत्य क्या है जानिए तो, क्यों हुआ यह खास।
सूर्य का जब मेष धनु में, हो कभी भी वास।।०१।।
राशियाँ बारह बनातीं, वर्ष का हर माह।
देवता अधिपति सभी के, जो दिखाते राह।।
माह जब यह बढ़ गया तो, हो गए सब स्याह।
विष्णु ने स्वीकार करके, पूर्ण कर दी चाह।।
माह उत्तम तब हुआ यह, त्याग कर परिहास।
सूर्य का जब मेष धनु में, हो कभी भी वास।।०२।।
दस गुणा फल दे सके यह, ईश कीर्तन पुण्य।
प्राप्त करते भक्त साधक, इष्ट का कारुण्य।।
संग ब्रह्मा विष्णु शंकर, मातु लक्ष्मी धन्य।
नाम जपिए राम पावन, संग कारज अन्य।।
है शुभद यह मास पावन, हर सके जो त्रास।
सूर्य का जब मेष धनु में, हो कभी भी वास।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

