सबसे इतना ही कहना है।
सबसे प्रेमिल ही रहना है।।
द्वेष भला क्यों मन में धारे।
सबको मिट्टी में मिलना है।।
धन बल यौवन नश्वर सारा।
अहं भला किसका रखना है।।
साँसों का भी ठौर अनिश्चित।
छोड़ जगत् सबको चलना है।।
माया जिस जीवन से सबको।
उसको भी पल में तजना है।।
मानव तन का मोल समझकर।
राम नाम उर में रखना है।।
सुखमय हो जीवन यह सारा।
जन-जन में हरि को लखना है।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

