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वाक्य भेद – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
पदों के सार्थक मेल से, ‘वाक्य’ जनम लेता है,
भावों और विचारों को, जो पूर्ण रूप देता है।
इसके भेदों की दुनिया में, दो पथ मुख्य दिखाए,
एक रचना के ढाँचे पर, दूजा अर्थ बताए।
1. रचना के आधार पर वाक्य (तीन भेद)
सरल, संयुक्त और मिश्र का, इसमें अनुपम खेल है,
बनावट के आधार पर, यह वाक्यों का मेल है।
• सरल वाक्य:
एक उद्देश्य और एक विधेय, सरल वाक्य की काया,
सीधी-सच्ची बात कहे यह, इसमें कोई न माया।
(उदाहरण: राम पढ़ता है।)
• संयुक्त वाक्य:
दो स्वतंत्र उपवाक्य जुड़ें जब, योजक बीच में आए,
‘और, किंतु, परंतु, इसलिए’, संयुक्त वाक्य कहलाए।
(उदाहरण: सुबह हुई और चिड़ियाँ चहकीं।)
• मिश्र वाक्य:
एक प्रधान उपवाक्य हो, आश्रित दूजा भाई,
‘कि, जो, क्योंकि, जब-तब’ से, मिश्र की हुई सगाई।
(उदाहरण: गुरु जी ने कहा कि कल परीक्षा है।)
2. अर्थ के आधार पर वाक्य (आठ भेद)
वाणी के आठों भावों को, अर्थ यहाँ दर्शाता है,
वाक्य के भीतर छिपा हुआ, संदेश हमें समझाता है।
• विधान और निषेध:
बात कहे जो सीधी-सादी, वह ‘विधान’ कहलाता है,
जहाँ ‘न, नहीं, मत’ आ जाए, वह ‘निषेध’ बन जाता है।
• प्रश्न और आज्ञा:
पूछे ‘क्या, क्यों, कहाँ, कैसे’, ‘प्रश्नवाचक’ की वाणी,
हुक्म, प्रार्थना या आदेश में, ‘आज्ञावाचक’ ज्ञानी।
• विस्मय और इच्छा:
‘अरे! अहा!’ अचरज दिखलाए, ‘विस्मयादि’ का मेला,
आशीष, दुआ और चाह जहाँ, ‘इच्छा’ का है रेला।
• संदेह और संकेत:
शायद, संभवतः कार्य हो, ‘संदेह’ इसे हम कहते,
एक क्रिया दूजी पर निर्भर, ‘संकेतवाचक’ में रहते।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

