कन्या! तुम केवल श्रद्धा नहीं, सृष्टि की रचनाकार हो।
सुकोमल होते हुए भी, नारी! नर का स्वाभिमान हो।
पिछली शताब्दी में केवल गृहिणी बनकर,
तुम पूरे गृह की श्रृंगार थीं।
जब-जब गृहस्वामी पर संकट आया,
तब-तब तुम उसकी अचूक सहयोगिनी बनीं।
जब भी सहारे की आवश्यकता पड़ी,
तुमने सखियों-सहेलियों को साथ खड़ा कर दिया।
श्रीकृष्ण ने भी तुममें शक्ति देखी, तुम्हें सम्मान दिया।
यह इतिहास बताता है—
पुरुष की अद्भुत शक्ति का आधार भी तुम ही हो।
सारे बंधन, सारे दुःख सहकर भी
तुमने प्रेम का दीप जलाए रखा।
अपनी दिव्य कलाओं से
पुरुष के जीवन को सँवारती रहीं।
तुम्हारे भीतर वात्सल्य है, करुणा है, दया है, श्रृंगार है।
वीरांगना का साहस है, प्रेम है, सतीत्व है, शक्ति का भंडार है।
इन्हीं गुणों से पुरुष का जीवन सफल और उद्धार होता है।
तुम ही सरस्वती हो,
तुम ही लक्ष्मी हो,
तुम ही दुर्गा, तुम ही काली हो।
तुम ही अनुसूया,
तुम ही पतिव्रता वृन्दा,
तुम ही सावित्री हो।
वास्तव में, तुम ही सृष्टि की रचनाकार हो।
कहीं बहन बनकर, कहीं माँ बनकर,
कहीं पत्नी बनकर,
एक ही आत्मा अनेक रूपों में
हर रिश्ते का कल्याण करती हो।
तुम नैहर और ससुराल—
दोनों का समान सम्मान रखती हो।
गृहस्थी ही नहीं,
देश का भी स्वाभिमान हो तुम।
आईएएस, पीसीएस और शिक्षा , प्रशासनिक सेवाओं में पहुँचकर,
गरीबों, पिछड़ों और असहायों की सेवा करती हो।
प्रह्लाद के नरसिंह भगवान की भाँति,
दीन-दुखियों की रक्षक बन जाती हो।
आधी रोटी खाकर भी
कर्तव्य की प्रहरी बनी रहती हो।
भोले-भाले परिवार का
जीवन सँवारने वाली तुम ही हो।
पर, तेरे बहते आँसुओं का मूल्य
यह संसार कहाँ समझ पाता है?
अपनी भूलों और कठोर व्यवहार से
तुझे दुखाया भी है, मुरझाया भी है।
फिर भी धैर्य रख,
धरती से ऊपर ईश्वर की महान सत्ता है।
जो तेरे कष्ट को समझते हैं,
वे ईश्वर के प्रिय हो जाते हैं।
और जो तेरे दुःख को नहीं समझते,
वे समय और ईश्वर—दोनों से दंड पाते हैं।
उमेश कुमार सिन्हा


