पद्यपंकज sandeshparak,Shakshanik,दिवस गौरैया-रूचिका

गौरैया-रूचिका


Ruchika

बड़ी मुश्किल से दिखती हैं,

गौरैया आजकल

छत के मुंडेरों पर

घर के आँगन में

अब उसका चहकना कानों में रस नही घोलता

अब उसके लिए जगह नही बची

घरों में।

गौरैया चली गयी है आबादी से दूर।

इस आस में की

शायद उसकी चहक कोई सुन ले वहाँ।

अब कहाँ गौरैया आती है

दाना चुगने

नही दिखता उसका घोंसला

घर के किसी कोने में

अलमारी के पीछे

खिड़की के ऊपर

रोशनदान में

क्योंकि सब हो गए हैं इतने सफाई पसन्द

हटा देते उसके घोंसले को।

आ जाओ गौरैया

आकर सीखला दो

कैसे तुम अपने छोटे से रूप में

पूरा आकाश नाप लेती हो

कैसे तुम अपने होने से

जीवन्तता का एहसास देती हो।

कैसे तुम्हारी चहक

जीवन में रस घोलते

और कैसे तुम हम स्वार्थी मानवों के बीच

रहकर भी

खुशहाल रहती हो।

रूचिका

राजकीय प्राथमिक विद्यालय कुरमौली

गुठनी सिवान बिहार

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