पद्यपंकज padyapankaj,Teachers Of Bihar,ToB PadhyaPankaj हाय किस्मत रेत-की – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

हाय किस्मत रेत-की – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’


RAMPAL SINGH ANJAN

हाय किस्मत रेत-की – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

भाद्रपद की अष्टमी तिथि,
पक्ष काला था भला।
रात आधी भवन कारा,
आ गए कान्हा लला।।

योग माया के भरोसे,
आँधियाँ चलने लगीं।
बेड़ियाँ सब ध्वंस होकर,
कंस को ठगने लगीं।

सामने सचमुच चतुर्भुज,
देखते वे रह गए।
पूर्व कथित भविष्यवाणी,
सत्य ही है कह गए।।

कर नहीं करवा रहे थे,
सोच कर द्वे दंग थे।
खुल गए थे बंध सारे,
पूर्व तक जो तंग थे।।

सृष्टि सारी टोकरी में,
भर गये ऐश्वर्य से।
खुद चतुर्भुज खोल ताले,
भर गए आश्चर्य से।।

टोकरी वसुदेव माथे,
खुद लिए बढ़ने लगे।
धर्म की जय घोष सुनकर,
पाप तन ढकने लगे।।

भाग्य यमुना के खुले थे,
माँ यशोदा सो रही।
भाग्यशाली थी प्रबल वो,
खुद प्रभो में खो रही।

देवकी का लाल था जो,
जन्म लेते छिन गया।
खुश मगर थी जानकर यह
दुख भरा दुर्दिन गया।

हाय रे दुर्भाग्य माते,
लाल बस दर्शन दिया।
दुग्ध से स्तन भरा जब,
दुग्ध दूजा ने पिया।।

कह गए “अनजान” हे री!,
जन्मदात्री देवकी।
बन गई क्यों? माँ यशोदा,
हाय किस्मत रेत-की।।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

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