पद्यपंकज padyapankaj,Teachers Of Bihar,ToB PadhyaPankaj खो रही है अस्मिता को – रामपाल प्रसादसिंह अनजान

खो रही है अस्मिता को – रामपाल प्रसादसिंह अनजान


RAMPAL SINGH ANJAN

खो रही है अस्मिता को – रामपाल प्रसादसिंह अनजान

है गिरी दीवार भारी,
टूटता आधार से।
रो रही सीता हमारी,
शील के व्यापार से।।
और क्या-क्या देखने को,
भाग्य में मेरा लिखा।
हो गया संस्कार नीचा,
था कभी ऊँचा दिखा।।

शब्द छंदों में समाए,
देखना दुश्वार है।
नारियाँ निर्लज्ज होतीं,
द्वेष का आहार है।।
हो रही है जो पढ़ाई,
पश्चिमी आलोक में।
खो रही है अस्मिता को,
गंदगी के थोक में।।

सीता छंद वार्णिक

रामपाल प्रसादसिंह अनजान
सेवानिवृत्त शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवेभदौर
ग्राम पोस्ट थाना भदौर
पंडारक पटना बिहार

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