मां भारती के साधक – मनु कुमारी

माँ भारती का साधक : माखनलाल चतुर्वेदी

कलम नहीं थी उनकी केवल,ज्वाला थी अंगार बनी।
शब्दों में राष्ट्र धड़कता था,भारत माँ साकार बनी।।

न भय लिखा, न दास्यता,न झुकी कभी उनकी लेखनी।
सत्य, त्याग, बलिदान लिए,चलती रही निर्भीक चेतनी।।

“पुष्प की अभिलाषा” में,त्यागका अमर उपदेश दिया।
काँटों पर खिलकर भी जिसने,देश-प्रेम का अर्थ जिया।।

कर्मवीर के संपादक बन,जगाई जन-जन में हुंकार।
हर लेख बना शंखनाद,हर पंक्ति बनी तलवार।।

स्वाधीनता संग्राम में,वे केवल कवि नहीं थे।
साधक थे, तपस्वी थे,राष्ट्र-यज्ञ के ऋत्विज थे।।

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर से,उनकी वाणी गूँज उठी।
भारत की आत्मा बोल पड़ी,हर शिरा देश में पूज उठी।।

आज भी उनकी कविताएँ,नस-नस में भरती आग।
जब-जब सोता राष्ट्र मन,वे देते नव अनुराग।।

नमन तुम्हें हे राष्ट्रकवि,कलम केअमर सपूत,
तुम्हारी साधना से सीखा,कैसे बनता कवि—दूत।।

स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी,विशिष्ट शिक्षिका प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर
सुपौल, ,बिहार

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