वट सावित्री व्रत।
कर सोलह शृंगार से,प्रकट स्वर्ग निज द्वार।
हे नारी!तू धन्य है,कितना पति से प्यार।।
कितना पति से प्यार,जलाती मुख की लाली।
नीचे तलवा ताप,मगर छूटे कब थाली।।
कहते कवि “अनजान”,निर्जला रहती है रह।
अंतस रख तैयार,साज सम्यक कर सोलह।।
शीतल छाया है नहीं,शाखी बरगद साथ।
नर्तन करती नारियाँ,झुका रही हैं माथ।।
झुका रही हैं माथ, पूजने आई दिल से।
परिक्रमा कर सात,निभाती व्रत मुश्किल से।।
कहते कवि “अनजान”,सुहागिन माँगें साया।
हटे नहीं दिन एक,शीश से शीतल छाया।।
धरती ऊपर आग में,रखती मन को शीत।
केवल प्रभु से माँगती,यम पर होए जीत।।
यम पर होए जीत,अकाल मृत्यु टल जाए।
सत्यवान-सा दृश्य,प्रकट निज भवन न आए।।
शुभता लेकर भाव,रंग सुंदरतम भरती।
कहते कवि “अनजान”,भरी है देशी धरती।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
सेवानिवृत शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवेभदौर

