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समय के उस पार
घड़ी की टिक-टिक से बहुत दूर,
जहाँ न ढलती शाम है, न उगता सूरज,
न कल की फिक्र है, न बीते कल का मलाल,
एक ऐसा संसार है, बेहद शांत और निश्छल।
वहाँ न कोई उम्र की लकीरें खींचता है,
न कोई दौड़ने की जल्दी में दिखता है,
थमी हुई हैं जहाँ वक़्त की तूफानी लहरें,
बस बहती है एक अनंत, मौन शांति।
वहाँ शब्दों की ज़ुबान नहीं होती,
चेहरों पर कोई नक़ाब नहीं होता,
मिट जाती हैं सरहदें, खो जाते हैं फासले,
बस आत्मा का आत्मा से सीधा रिश्ता होता है।
वो जो खो गया है इस दुनिया की भीड़ में,
जिसे हम ढूंढते हैं यादों के धुंधलके में,
वह मुस्कुराता हुआ वहीं तो खड़ा है,
इस पार की हर बंदिश से स्वतंत्र होकर।
समय के उस पार, एक ठहराव है,
मोह-माया से परे, एक सच्चा लगाव है,
जीवन और मृत्यु के छोर जहाँ मिलते हैं,
उसी असीम शून्य में, हम और तुम मिलते हैं।
जहाँ खो जाता है सांसों का आना-जाना,
न कुछ पाना रहता है, न कुछ गंवाना,
जहाँ राग-द्वेष की कोई दीवार नहीं होती,
और मिटने की फिर कोई लाचारी नहीं होती।
वह प्रकाश का एक ऐसा शाश्वत झरना है,
जहाँ बहकर ही इस जीवन को सँवरना है,
सारे बंधनों को हँसकर तोड़ जाते हैं हम,
जब समय के उस पार कदम बढ़ाते हैं हम।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

