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सुर, ताल और नर्तन की दिव्य धारा – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
गौहर जान की गर्वीली तान से गूंजा अंबर सारा,
जानकीबाई की छप्पन छुरी ने हर एक दिल को संवारा।
रसूलनबाई के कंठ से फूटती पूरब-ठुमरी की धार,
असगरी बेगम और बड़ी मोतीबाई का अनुपम शृंगार।
कठोर तपस्या की मूरत बनीं केसरबाई की तान,
हीराबाई और मोगुबाई ने बढ़ाया घरानों का मान।
मल्लिका-ए-गज़ल बेगम अख्तर का वो दर्द भरा तराना,
सुब्बुलक्ष्मी की मीरा जैसी भक्ति में झूम उठा ज़माना।
पट्टम्माल और वसंतकुमारी ने कर्नाटक संगीत सजाया,
गंगूबाई और सिद्धेश्वरी ने सुर का पावन दीप जलाया।
सुमति मुटाटकर, गिरिजा देवी के सुर हैं बड़े अनूप,
किशोरी अमोनकर, प्रभा अत्रे में दिखा मां सरस्वती का रूप।
शन्नो खुराना, सुलोचना और नैना देवी की पावन रीत,
शोभा गुर्टू की ठुमरी ने जगाया रूहानी प्रीत।
अल्लाह जिलाई का मांड और शकीला की कव्वाली का रंग,
गुलाबबाई की नौटंकी और विंध्यवासिनी के लोकगीत तरंग।
तीजनबाई की पंडवानी ने छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया,
फिर नृत्यांगनाओं के घुंघरुओं ने अद्भुत समां बंधाया।
बाला सरस्वती, रुक्मिणी अरुंडेल का वो भरतनाट्यम पावन,
मृणालिनी, इंद्राणी और शांता राव ने मोह लिया मनभावन।
सितारा देवी के कथक में थी बिजली जैसी चपलता,
संयुक्त पाणिग्रही, झावेरी बहनों की अद्भुत कलात्मकता।
कमला लक्ष्मण, ऋता देवी और यामिनी की वो फिरकन,
सोनल मानसिंह और उमा शर्मा के थिरकते सुंदर चरन।
स्वप्न सुंदरी, कनक रेले और सरोज़ा का था अद्वितीय नाम,
राधा रेड्डी और माधवी मुद्गल की साधना को शत-शत प्रणाम।
शोभना नारायण के कथक में दिखा ओज का अनुपम रूप,
और वादकों की दुनिया में बिखरी कला की स्वर्णिम धूप।
शरण रानी के सरोद और अन्नपूर्णा के सुरबहार की झंकार,
एन. राजम के वायलिन ने बिखेरा सुरों का अनुपम संसार।
कल्याणी राय की सितार और आबान मिस्त्री का तबला-वादन,
बागेश्वरी देवी की शहनाई से महक उठा सारा उपवन।
और अंत में सुरों की मल्लिका, जो हैं भारत का गौरव गान,
लता मंगेशकर की अमर आवाज़, जो है इस देश की शान।
इन सभी देवियों के चरणों में, कला का ये शीश झुके,
इनके सुरों की पावन गंगा, युगों-युगों तक कभी न रुके।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

