कटे पेड़ से चाहते हैं भलाई
मिलेगी कभी भी।
फटे वस्त्र की चाहते हैं जुड़ाई
सिलेगी कभी भी।।
नहीं है उजाला करूँ तो करूँ क्या
मरा भी न जाता।
सुना है कि अंधे सभी दौड़ते हैं
रहा भी न जाता।।
भरी जिंदगी साथ की है कमाई
ढली ही नहीं जो।
चले थे लगाते भली वाटिका को
फली ही नहीं जो।
हुआ है अजूबा कमाई करोड़ों
कई पेट भूखे।
नहीं नींद आती मुझी में बुराई
कई नेत्र सूखे।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
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