चैन कहां से पाओगे – विजय शंकर ठाकुर
प्रकृति से टकराओगे,
तो चैन कहां से पाओगे
ग़र पेड़ काटते जाओगे,
धरती की तपिश बढ़ाओगे,
पानी को तरश ही जाओगे,
तो चैन कहां से पाओगे,
प्रकृति से टकराओगे,
तो चैन कहां से पाओगे।
पेड़ों को टपका करके,
अपना आशियाना बनाओगे,
अपनी खुदगर्ज़ी की खातिर,
पर्यावरण भूल ही जाओगे।
प्रकृति से टकराओगे,
तो चैन कहां से पाओगे।
प्रकृति ने पाला तुझको,
हर वक्त उसी ने संभाला तुझको,
यह याद नहीं रख पाओगे,
उसका कर्ज़ चुका न पाओगे,
प्रकृति से टकराओगे,
फिर चैन कहां से पाओगे।
विजय शंकर ठाकुर
विशिष्ट शिक्षक
म वि गोगलकटोल
प्रखंड बोखरा, सीतामढ़ी।

