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पथ अपना अपना – धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर


Dharmendra Kumar Thakur

लेख सुनें तैयार

पथ अपना अपना – धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर

जीवन के इस महासमर में, कोटि-कोटि राही चलते हैं,

सबके अपने-अपने पथ हैं, सबके अपने बल जलते हैं।

कोई छूता गगन-शिखर को, कोई पाताल चीर देता,

हर पथिक स्वयं में एक सृजन, जो अपनी ही तक़दीर देता।

एक पग धरे तो धरती काँपे, अम्बर में कम्पन हो जाए,

जिस पथ पर वह राही बढ़े, वह मरुथल भी उपवन हो जाए।

सूरज को मुट्ठी में भींचे, कुछ ऐसे भी गतिमान यहाँ,

हर एक डगर की छाती पर, लिखते अपनी पहचान यहाँ।

कोई सागर की लहरों को, पल में मरुभूमि बनाता है,

कोई अंगारों पर चलकर, शीतल चन्दन बिखराता है।

नभ के तारों को तोड़-तोड़, पथ की दीवालें चुनते हैं,

अपनी साँसों के ताने से, ब्रह्मांड का ताना बुनते हैं।

तूफ़ान थमे, पर्वत झुक जाए, जब बढ़ते हैं इन सबके चरण,

काल स्वयं भी सहम खड़ा, करता इनका पल-पल अभिनन्दन।

लाखों पथिक, पर हर पथ का, अपना ही एक वितान यहाँ,

सबके अपने-अपने बल से, रचता है नया जहान यहाँ।

दिशाएं दास बनी खड़ी हैं, इन राही के हुंकारों से,

व्योम भी छोटा पड़ जाता है, इनके दृढ़ संकल्पों से।

जिसने अपनी राह चुनी, वह महाकाल से लड़ जाता है,

मृत्यु का भय भी हार माने, जब पथिक आगे बढ़ जाता है।

एक-एक पग में छिपे हुए हैं, प्रलय और नव-निर्माण यहाँ,

अपनी ही धुन में मस्त खड़े, हर राह के हैं भगवान यहाँ।

नदियों की धारा मोड़ रहे, कुछ ऐसे भी बलवान पथिक,

शून्यता को भी चीरकर, रचते नया विज्ञान पथिक।

कोई नभ की छाती चीरकर, अमृत का घट ले आता है,

कोई पैरों की ठोकर से, सोता पर्वत जगाता है।

ये राहें साधारण नहीं, ये देवों का आह्वान हैं,

हर पथिक स्वयं में महाकाव्य, हर डगर एक वरदान है।

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला

रानीगंज अररिया 

08.10.2026

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