भाग गया है शीत,निकल कर देखो।
बाहर किरणें प्रीत,निकल कर देखो।।
पगडंडी के प्रांत,आज है भारी।
हरियाली है मगन,मार सिसकारी।।
तृण पर मोती दाॅंत,जड़े अब टूटे।
थे इतने अनमोल,साथ क्यों छूटे?।।
बचपन का दिन एक,साथ छोड़ेगा।
जब तक है यह साथ,मोह जोड़ेगा।।
कल तक था जो ठोस,आज पिघला है।
बंधक था आलोक,आज निकला है।।
हुआ उसे तू भूल,फूल खिल जाओ।
अपनी आभा बिम्ब,विश्व फैलाओ।।
सोनू मोनू दौड़,लगा कर आओ।
हवा फेफड़ा फेंक,स्वस्थ हो जाओ।।
ग्रीवा कंचन हार,उसे अब फेंको।
सर्षप पॅंखुड़ी पीत,कंठ भर देखो।।
कागज ऊपर छाप,हृदय कर पीला।
जाओ कुछ दिन भूल,गगन है नीला।।
सुख का ही तो हाट, चतुर्दिक फैला।
मांजर मंजुल ढेर,भरा हर थैला।।
सुधीजनों के पास,बैठ मत चीखो।
कहते हैं “अनजान”,पढ़ो कुछ सीखो।।
भरे हुए भंडार,समय पर लूटो।
राग-द्वेष बेकार,मानकर कूटो।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’ सेवानिवृत शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवेभदौर
