ले ली है अब अपनी, प्रज्ञा निखार।
रहते हैं हम होकर, सबसे उदार।।
क्षमा दान दूँ अब, तजकर विलाप।
रखना सहज सभी से, मुझको मिलाप।।
सबको गले लगाऊँ, यह है विचार।
ले ली है अब अपनी, प्रज्ञा निखार।।०१।।
रहता हर-पल जैसे, मैं हूँ अबोध।
करता नहीं किसी का, कोई विरोध।।
भाव सहज मैं करता, प्रेमिल प्रसार।
ले ली है अब अपनी, प्रज्ञा निखार।।०२।।
सरस मृदुल रख वाणी, करता प्रयास।
नहीं कभी हो कोई, मुझसे उदास।।
सीख गया हूँ अब मैं, बीती बिसार।
ले ली है अब अपनी, प्रज्ञा निखार।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८

