धर्म-संकट – जितेन्द्र पासवान


Jitendra Paswan

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धर्म-संकट – जितेन्द्र पासवान

महाभारत युद्ध का जब शंखनाद हुआ,
श्रीकृष्ण-अर्जुन में एक संवाद हुआ।

“देख रहे हो, हे केशव! ये पराए नहीं, ये अपने हैं सब!
किस-किस पर मैं बाण चलाऊँ?
किस-किस को अपनी बैरी मानूँ?

गाण्डीव न उठा पाऊँगा,
युद्ध में किसी का सिर न काट पाऊँगा।
हे माधव! ऐसा अधर्म न कर पाऊँगा,
मृत्यु-शय्या पर खुद सो जाऊँगा।”

“सुनो पार्थ, मेरी बात!
जहाँ खड़े हो, वह रणभूमि है।
इसमें खड़ा हर इंसान
धर्म का ख़ूनी है।

तुम जिसे मानते हो अपना,
पांचाली की बात थी—
खींचा गया चीर,
या था कोई सपना?

तुम किस अधर्म की बात करते हो?
हुए नारी के अपमान को
तुम भी धर्म कहते हो?

हे पार्थ! ये धर्म-अधर्म की लड़ाई है।
रणभूमि में जो खड़ा है,
ये अपना नहीं, पराया है।

हे धनंजय! तू उठा गाण्डीव,
प्रत्यंचा चढ़ा!
पापों से बोझिल धरा का
पाप मिटा!”

जितेन्द्र पासवान (शिक्षक)
P.N.M. +2 हाई स्कूल, पिपराही

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