शिक्षा में क्रांति अभी बाकी है – विवेक कुमार
एक शिक्षक का जुनून अभी बाकी है…
सफर शुरू हुआ था
एक छोटे से ग्रामीण विद्यालय से,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गवसरा मुसहर से—
जहाँ संसाधन कम थे,
इमारत की सुविधाएँ कम थीं,
लेकिन बच्चों की आँखों में
सपने कम नहीं थे।
वहाँ समाज के उस तबके के बच्चे थे
जिनके लिए शिक्षा तक पहुँचना भी
एक चुनौती हुआ करती थी।
महादलित समाज, अल्पसंख्यक, अत्यंत पिछड़े
और पिछड़े परिवारों के बच्चे—
उनके बीच खड़ा एक शिक्षक
सिर्फ पाठ नहीं पढ़ा रहा था,
वह भविष्य लिखने की कोशिश कर रहा था।
मैंने किताबों से पहले
बच्चों को पढ़ा,
उनकी रुचि पढ़ी,
उनकी समस्याएँ पढ़ीं,
उनके घरों की परिस्थितियाँ पढ़ीं।
अभिभावकों से मिला,
जनप्रतिनिधियों से मिला,
प्रधानाध्यापक से मिला,
लोगों को जोड़ा,
क्योंकि मेरा विश्वास था—
“विद्यालय अकेला बच्चों का भविष्य नहीं बदल सकता,
समाज को भी शिक्षा की इस यात्रा में साथ आना होगा।”
फिर मैंने देखा
पाँचवीं के बाद कई बच्चियाँ
विद्यालय से दूर हो जाती थीं।
विद्यालय की दूरी,
परिवार की मजबूरी
और सामाजिक परिस्थितियाँ
उनके सपनों के रास्ते में खड़ी थीं।
मन में एक सवाल उठता था—
क्या किसी बच्ची का सपना
सिर्फ इसलिए छोटा हो जाए
कि उसके गाँव में आगे की पढ़ाई का विद्यालय नहीं है?
नहीं!
तभी मैंने तय किया—
लड़कियों की शिक्षा के लिए
कुछ करना होगा।
संसाधन कम थे,
लेकिन हौसला बड़ा था।
2007 में
TLM प्रदर्शनी से एक नया अध्याय शुरू हुआ।
बच्चों के साथ मिलकर
सीखने को आसान और रोचक बनाने वाली
शिक्षण-सामग्री तैयार की।
पहली कोशिश में
द्वितीय स्थान मिला।
लेकिन मंजिल कहाँ थी?
अगले वर्ष
फिर कोशिश की,
और इस बार
प्रथम स्थान।
फिर सीआरसी से बीआरसी तक
यह कारवाँ चलता रहा।
कभी साधन मिले,
कभी नहीं मिले।
कभी लोगों ने कहा—
“इतनी मेहनत क्यों करते हैं?”
कभी कहा गया—
“इससे क्या फायदा होगा?”
लेकिन मेरे भीतर एक आवाज थी—
“अगर बच्चों के सीखने में एक प्रतिशत भी सुधार होगा,
तो यह प्रयास बेकार नहीं जाएगा।”
एक बार प्रदर्शनी के लिए
संसाधन और उचित स्टॉल तक उपलब्ध नहीं था।
लोगों ने कहा—
छोड़ दीजिए।
लेकिन मैंने नहीं छोड़ा।
जहाँ जगह मिली,
वहीं से शुरुआत की।
क्योंकि शिक्षक के लिए
मंच बड़ा होना जरूरी नहीं,
उसका उद्देश्य बड़ा होना चाहिए।
मेहनत रंग लाई।
बीआरसी स्तर पर भी
प्रथम स्थान मिला।
और फिर वही प्रयास
बालिकाओं की शिक्षा के लिए
एक बड़ी जीत में बदल गया।
प्रखंड प्रमुख ने अपना वचन निभाया
और मेरा विद्यालय
राजकीय प्राथमिक विद्यालय से
उत्क्रमित मध्य विद्यालय गवसरा मुसहर बना।
उस दिन सिर्फ विद्यालय अपग्रेड नहीं हुआ था—
उस दिन कई बच्चियों के सपनों की
कक्षा पाँच से कक्षा आठ तक की यात्रा शुरू हुई थी।
और मैंने जाना—
एक शिक्षक की छोटी-सी कोशिश
किसी बच्चे के जीवन में
बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है।
फिर कारवाँ आगे बढ़ता गया।
अंततः
विद्यालय मध्य से उच्च माध्यमिक में परिणत हुआ।
बाल संसद,
मानव शृंखला,
स्लोगन,
कलाकृतियाँ,
बाल मेले,
रोचक गतिविधियाँ—
हर अवसर को मैंने
बच्चों के सीखने का अवसर बनाया।
2021 में प्रखंड स्तर पर
मेरे नवाचारों को सम्मान मिला,
2021-22 में जिला स्तर पर
शिक्षक सम्मान मिला।
लेकिन सम्मान के बाद भी
सफर रुका नहीं।
2024 में
जब एक नई भूमिका मिली—
+2 हिंदी शिक्षक के रूप में
भोला सिंह उच्च माध्यमिक विद्यालय पुरुषोत्तमपुर में—
तो लगा जैसे
जीवन ने मुझे फिर एक नई कक्षा दे दी है।
नई कक्षा,
नई उम्र के विद्यार्थी,
नई चुनौतियाँ
और नई जिम्मेदारियाँ।
मैंने हिंदी को
सिर्फ एक विषय नहीं माना।
मैंने बच्चों से कहा—
हिंदी सिर्फ परीक्षा पास करने की भाषा नहीं,
हिंदी हमारे विचारों को
अभिव्यक्ति देने की शक्ति है।
व्याकरण को रोचक बनाया,
रोल-प्ले और गतिविधियों को अपनाया,
हर कक्षा में प्रेरक संवाद जोड़े,
सामान्य ज्ञान के प्रश्नों से
बच्चों की जिज्ञासा जगाई।
युथ क्लब और इको क्लब के माध्यम से
बच्चों को गतिविधियों से जोड़ा।
और फिर 2025 में
मुझे राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान मिला।
लेकिन आज भी
मैं खुद से यही कहता हूँ—
सम्मान मंजिल नहीं है,
सम्मान तो उस रास्ते की
एक छोटी-सी पहचान है।
बीस वर्ष से अधिक बीत गए…
लेकिन मेरे भीतर का शिक्षक
आज भी थका नहीं है।
आज भी जब किसी कार्यक्रम का
प्रस्ताव स्वीकार करता हूँ,
तो रात में नींद कम
और विचार ज्यादा आते हैं—
कैसे होगा?
क्या नया करूँ?
बच्चों को और बेहतर कैसे जोड़ूँ?
इस बार पहले से अच्छा कैसे करूँ?
क्योंकि—
शिक्षक की उम्र बढ़ सकती है,
लेकिन उसका जुनून बूढ़ा नहीं होना चाहिए।
आज शिक्षक दिवस पर
मैं अपने सभी शिक्षक साथियों से
एक विनम्र अपील करना चाहता हूँ—
आइए,
हम सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा न करें,
बच्चों के सपने पूरा करने का माध्यम बनें।
सिर्फ अंक न देखें,
बच्चे की प्रतिभा देखें।
सिर्फ कमजोर बच्चे की कमी न देखें,
उसके भीतर छिपी संभावना देखें।
सिर्फ विद्यालय की दीवारें न देखें,
उन दीवारों के भीतर
बनते हुए भविष्य को देखें।
और अगर संसाधन कम हों,
तो निराश मत होना—
क्योंकि संसाधनों से बड़ा
शिक्षक का संकल्प होता है।
अगर रास्ते में बाधाएँ आएँ,
तो रुकना मत—
क्योंकि एक शिक्षक के कदम रुकते हैं,
तो किसी बच्चे का सपना रुक सकता है।
आइए,
हर बच्चे को अवसर दें,
हर बच्ची को उड़ान दें,
हर कक्षा को प्रयोगशाला बनाएं,
हर विद्यालय को उम्मीद का केंद्र बनाएं।
क्योंकि—
एक शिक्षक बदलेगा,
तो एक कक्षा बदलेगी।
एक कक्षा बदलेगी,
तो एक विद्यालय बदलेगा।
एक विद्यालय बदलेगा,
तो एक समाज बदलेगा।
और जब शिक्षक मिलकर बदलेंगे—
तब शिक्षा में क्रांति आएगी!
लेकिन याद रखिए—
क्रांति अभी बाकी है…
क्योंकि बच्चों के सपने अभी बाकी हैं।
मेरा सफर अभी बाकी है…
क्योंकि शिक्षा का बदलाव अभी बाकी है।
मेरी उम्र बढ़ी है,
मेरा जुनून नहीं।
बीस साल बीत गए,
लेकिन मेरे अंदर का शिक्षक
आज भी कहता है—
“कुछ और करना है…
बच्चों के लिए कुछ और करना है…”
और जब तक
किसी बच्चे की आँख में सपना है,
जब तक किसी बच्ची को
अपने भविष्य के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है,
जब तक किसी शिक्षक के भीतर
कुछ बेहतर करने की आग बाकी है—
तब तक…
शिक्षा में क्रांति बाकी है।
और मेरे अंदर…
एक शिक्षक का जुनून बाकी है।
मौलिक एवं स्व रचित
विवेक कुमार
भोला सिंह उच्च माध्यमिक विद्यालय, पुरुषोत्तमपुर, कुढ़नी, मुज़ o

