आध्यात्मिक दुखों का कोई सहारा नहीं – कार्तिक कुमार
मन के भीतर उठता दुख, बाहर इसका उपचार नहीं।
आध्यात्मिक पीड़ा ऐसी, जिसका कोई सहारा नहीं।
धन-दौलत सब पास रहे, फिर भी मन खुशहाल नहीं।
महलों में भी शांति कहाँ, यदि अंतर में उजियारा नहीं।
तन के दुख की दवा मिले, वैद्य करे उपचार कहीं।
मन के घाव भी भर जाते, प्रेम मिले संसार में कहीं।
पर आत्मा की व्यथा गहरी, इसका कोई बाजार नहीं।
भीतर का जो अंधकार है, उसका कोई व्यापार नहीं।
मोह-माया के बंधन में, जीव भटकता रहता है।
सुख की खोज में दिन-रात, अपना जीवन कहता है।
इच्छाओं की आग जले तो, मन को मिलता आराम नहीं।
आत्मिक प्यास बुझाने वाला, जग में कोई आधार नहीं।
रिश्ते सारे साथ निभाएँ, जब तक स्वार्थ जुड़ा रहे।
संकट आए राह कठिन हो, कौन सदा फिर खड़ा रहे।
अपना कहने वाले भी तब, देते सच्चा साथ नहीं।
जन्म-मरण की इस यात्रा में, कोई जग का साथ नहीं।
गुरु-वाणी यदि राह दिखाए, जीवन में प्रकाश मिले।
सत्य-साधना के पथ पर चलकर, मन को मधुर विश्वास मिले।
भीतर बैठे परम तत्व को, जिसने अब तक जाना नहीं।
उसके जीवन का गहन रहस्य, उसने अभी पहचाना नहीं।
सांसारिक सुख क्षणभंगुर हैं, जैसे बादल की छाँव।
आज हँसी है अधरों पर तो, कल हो सकता मन में घाव।
जो आत्मा को जान गया है, उसको कोई भार नहीं।
सत्य-ज्ञान से बढ़कर जग में, कोई सुंदर उपहार नहीं।
ध्यान करो अपने अंतर का, मौन में उत्तर मिलता है।
निर्मल मन के दर्पण में, सत्य स्वयं ही खिलता है।
भीतर जब प्रभु का दीप जले, फिर कोई अंधकार नहीं।
आत्मज्ञान की ज्योति मिले तो, दुख का स्थायी अधिकार नहीं।
कर्मों का फल भोगना पड़ता, इससे कोई बचता नहीं।
सत्य मार्ग पर चलने वाला, जीवन में फिर डरता नहीं।
नाम-स्मरण और सत्संग ही, मन का सच्चा सहारा है।
गुरु-कृपा की छाया पाकर, भवसागर से किनारा है।
दुख चाहे आध्यात्मिक हो, धैर्य कभी खोना नहीं।
सत्य-प्रेम की राह पकड़कर, अपने मन को रोना नहीं।
जग से सहारा माँगोगे तो, शायद कोई साथ न दे।
अंतर के परमात्मा को खोजो, वह हर पल विश्वास दे।
जब सब सहारे छूट जाएँ, तब भीतर दीप जलाना।
अपने अंतर के सत्य स्वरूप को, पहचानना और अपनाना।
आध्यात्मिक दुख मिटेगा जब, ज्ञान का उजियारा होगा।
ईश्वर का सच्चा सहारा पाकर, जीवन फिर से प्यारा होगा।
मन के भीतर उठता दुख, बाहर इसका उपचार नहीं।
आध्यात्मिक पीड़ा ऐसी, जिसका कोई सहारा नहीं।
धन-दौलत सब पास रहे, फिर भी मन खुशहाल नहीं।
महलों में भी शांति कहाँ, यदि अंतर में उजियारा नहीं।
तन के दुख की दवा मिले, वैद्य करे उपचार कहीं।
मन के घाव भी भर जाते, प्रेम मिले संसार में कहीं।
पर आत्मा की व्यथा गहरी, इसका कोई बाजार नहीं।
भीतर का जो अंधकार है, उसका कोई व्यापार नहीं।
मोह-माया के बंधन में, जीव भटकता रहता है।
सुख की खोज में दिन-रात, अपना जीवन कहता है।
इच्छाओं की आग जले तो, मन को मिलता आराम नहीं।
आत्मिक प्यास बुझाने वाला, जग में कोई आधार नहीं।
रिश्ते सारे साथ निभाएँ, जब तक स्वार्थ जुड़ा रहे।
संकट आए राह कठिन हो, कौन सदा फिर खड़ा रहे।
अपना कहने वाले भी तब, देते सच्चा साथ नहीं।
जन्म-मरण की इस यात्रा में, कोई जग का साथ नहीं।
गुरु-वाणी यदि राह दिखाए, जीवन में प्रकाश मिले।
सत्य-साधना के पथ पर चलकर, मन को मधुर विश्वास मिले।
भीतर बैठे परम तत्व को, जिसने अब तक जाना नहीं।
उसके जीवन का गहन रहस्य, उसने अभी पहचाना नहीं।
सांसारिक सुख क्षणभंगुर हैं, जैसे बादल की छाँव।
आज हँसी है अधरों पर तो, कल हो सकता मन में घाव।
जो आत्मा को जान गया है, उसको कोई भार नहीं।
सत्य-ज्ञान से बढ़कर जग में, कोई सुंदर उपहार नहीं।
ध्यान करो अपने अंतर का, मौन में उत्तर मिलता है।
निर्मल मन के दर्पण में, सत्य स्वयं ही खिलता है।
भीतर जब प्रभु का दीप जले, फिर कोई अंधकार नहीं।
आत्मज्ञान की ज्योति मिले तो, दुख का स्थायी अधिकार नहीं।
कर्मों का फल भोगना पड़ता, इससे कोई बचता नहीं।
सत्य मार्ग पर चलने वाला, जीवन में फिर डरता नहीं।
नाम-स्मरण और सत्संग ही, मन का सच्चा सहारा है।
गुरु-कृपा की छाया पाकर, भवसागर से किनारा है।
दुख चाहे आध्यात्मिक हो, धैर्य कभी खोना नहीं।
सत्य-प्रेम की राह पकड़कर, अपने मन को रोना नहीं।
जग से सहारा माँगोगे तो, शायद कोई साथ न दे।
अंतर के परमात्मा को खोजो, वह हर पल विश्वास दे।
जब सब सहारे छूट जाएँ, तब भीतर दीप जलाना।
अपने अंतर के सत्य स्वरूप को, पहचानना और अपनाना।
आध्यात्मिक दुख मिटेगा जब, ज्ञान का उजियारा होगा।
ईश्वर का सच्चा सहारा पाकर, जीवन फिर से प्यारा होगा।
प्रस्तुति: कार्तिक कुमार
विद्यालय: मध्य विद्यालय कटरमाला, गोरौल, वैशाली
मोबाइल: 7004318121
पता: कटरमाला, प्रखंड गोरौल, जिला वैशाली, बिहार

