सजनी अपने आप से – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
ट्रेन सवारी करके सजनी, देख रही रस्ते भर सपने।
आस-पास की सुंदरता भी, कभी नहीं लगती है अपने।।
पिया मिलन की घड़ियाॅं गिनती, ॲंखियाॅं जरा लगी हैं थकने।
सिटी विरहिनी मुझे जगाकर, छोड़ गई है मुझको झखने।।
दूर क्षितिज पर बादल भी है, लगे गगन नीले को ढकने।
बारिश हो पर जरा ठहरकर, पिया मिलन पर आना रसने।।
शाम सुहानी में दिल हरसे, दिवस लगा है अब तो ढलने।
जान रहे हो साजन तुमको, छोड़ गई थी मैं क्या तपने?।
समय भगाया है जो दिन को,स्वागत रजनी लगी है करने।
स्वागत में है खड़ी विभावरी, समय उसे दो कुछ पल सजने।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
पूर्वप्रभारी मध्य विद्यालय दर्वेभदौर
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